मांगलिक दोष परिहार पूजा अनुष्ठान
मांगलिक शब्द सुनते ही वर-कन्या के अभिभावक सतर्क हो जाते हैं। विवाह सम्बन्धों के लिए मांगलिक शब्द एक प्रकार से भय तथा अमंगल का सूचक बन गया है। परन्तु प्रत्येक मांगलिक जातक विवाह के अयोग्य नहीं होता। सामान्यतः मांगलिक दिखाई पड़ने वाली जन्म कुण्डलियां भी ग्रहों की स्थिति तथा दृष्टि के कारण दोष रहित हो जाती है। ज्योतिष में मांगलिक दोष की धारणा कब आरंभ हुई, इस संबंध में निरचित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता, परंतु महर्षि पराशर, जेमनी, वराहमिहिर आदि आचार्यों ने इस विषय को ज्यादा तूल नहीं दिया है। कुछ ज्योतिषी लेखकों ने मांगलिक दोष का डर (हवा) खड़ा कर दिया। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार मांगलिक दोष का विचार लग्न के अतिरिक्त चंद्रमा, शुक्र तथा सप्तम भाव के स्वामी से भी करना चाहिए। लग्न कुंडली में मंगल पहले, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में हो तो मांगलिक दोष होता है। मंगल दोष को वैवाहिक जीवन में बाधक माना जाता है। मिथकों के अनुसार मांगलिक दोष को, वर-वधु के स्वास्थ्य तथा आयु के लिये हानि कारक माना जाता है। लेकिन केवल देखने और कहने मात्र से मांगलिक दोष पूर्ण जन्म कुंडली नहीं बन जाती। अपितु मांगलिक दोष को काटने व कटजाने वाले विविध ग्रह योगों पर भी नजर डालनी चाहिए। मांगलिक योग सदैव अमांगलिक नहीं होता है। पूरी जन्म कुंडली विश्लेषण के बाद अगर लगता है की मांगलिक दोष कष्ट कारी है तो मांगलिक दोष परिहार पूजा अनुष्ठान कर इस दोषों से छुटकारा पाया जा सकता हैं। विशेष जानकारी के लिए आप हमसे संपर्क कर सकते हैं।